24 दिसंबर 1996 को अस्तित्व में आया पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम, 1996 — जिसे आमतौर पर पेसा कानून कहा जाता है — आदिवासी समाज के स्वशासन, ग्रामसभा की सर्वोच्चता और प्राकृतिक संसाधनों पर समुदाय के अधिकार को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से लाया गया था। देश में पेसा कानून के लागू हुए अब लगभग 29 वर्ष पूर्ण होने को हैं, लेकिन विडंबना यह है कि इतने लंबे समय के बाद भी यह कानून अधिकांशतः कागज़ों तक ही सीमित दिखाई देता है।
पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों में लागू होने वाला यह कानून उस समय आदिवासी समाज के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि माना गया था। लंबे संघर्षों और आंदोलनों के बाद यह उम्मीद जगी थी कि अब गांवों में स्वशासन को संवैधानिक मान्यता मिलेगी और आदिवासी समाज अपने जंगल, जमीन और जल जैसे संसाधनों पर स्वयं निर्णय ले सकेगा। लेकिन जमीनी हकीकत इन उम्मीदों से कोसों दूर नजर आती है।
आदिवासी लोकतंत्र की बुनियाद, पर अमल शून्य
पेसा कानून को आदिवासी लोकतंत्र की बुनियाद के रूप में देखा गया था। यह ऐसा कानून था, जो शासन की दिशा ऊपर से नीचे नहीं, बल्कि नीचे से ऊपर तय करने की कल्पना करता है। ग्रामसभा को सर्वोच्च संस्था मानते हुए उसे विकास योजनाओं, संसाधनों के उपयोग और स्थानीय विवादों के समाधान का अधिकार दिया गया।
लेकिन ढाई दशक से अधिक समय बीतने के बावजूद यह सवाल आज भी कायम है कि क्या ग्रामसभाएं वास्तव में सशक्त हो पाई हैं? क्या आदिवासी स्वशासन को वह सम्मान और अधिकार मिल सके हैं, जिनका वादा पेसा कानून में किया गया था, या फिर ग्रामसभाएं केवल औपचारिक संस्थाओं में बदलकर रह गई हैं?
विकास की दिशा कौन तय कर रहा है?
पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों में चल रही विकास प्रक्रियाओं पर नजर डालें तो चिंता और गहरी हो जाती है। सवाल यह नहीं है कि विकास होना चाहिए या नहीं, बल्कि यह है कि विकास की दिशा कौन तय कर रहा है। क्या गांवों के भविष्य का फैसला ग्रामसभाओं द्वारा लिया जा रहा है, या फिर बाहर से थोपे गए विकास मॉडल आदिवासी इलाकों की नियति निर्धारित कर रहे हैं?
आज भी परंपरागत ज्ञान, सामुदायिक समझ और स्थानीय जीवन-पद्धतियां प्रशासनिक निर्णयों में हाशिये पर हैं। खनन परियोजनाएं, औद्योगिक विस्तार और बुनियादी ढांचे के नाम पर आदिवासी इलाकों में फैसले अक्सर ग्रामसभा की सहमति के बिना लिए जा रहे हैं, जबकि पेसा कानून का मूल उद्देश्य ही यही था कि प्राकृतिक संसाधनों पर पहला अधिकार ग्रामसभा का हो।
2022 का अध्ययन: पेसा की असल तस्वीर
पेसा कानून के क्रियान्वयन की वास्तविक स्थिति को समझने के लिए वर्ष 2022 में सामाजिक कार्यकर्ताओं, गैर-सरकारी संगठनों और जन संगठनों द्वारा एक संयुक्त अध्ययन किया गया। इस अध्ययन के निष्कर्ष बेहद चिंताजनक रहे।
रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया कि केंद्र और राज्य सरकारों ने पेसा के प्रभावी क्रियान्वयन को कभी गंभीरता से प्राथमिकता नहीं दी। कई राज्यों ने पेसा के नाम पर जो नियम बनाए, वे केंद्रीय पेसा कानून की मूल भावना के विपरीत पाए गए। परिणामस्वरूप, आदिवासी स्वशासन कमजोर पड़ा और समुदाय के अधिकारों का क्षरण लगातार बढ़ता गया।
गांव गणराज्य और आदिवासी लोकतंत्र की परंपरा
भारत की आत्मा उसके गांवों में बसती है। गांव केवल प्रशासनिक इकाइयां नहीं रहे, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक जीवन के जीवंत केंद्र रहे हैं। गांव गणराज्य यानी प्रत्यक्ष लोकतंत्र की परंपरा भारत की सबसे पुरानी व्यवस्थाओं में से एक रही है, जिसे आदिवासी समाज ने पीढ़ियों तक न केवल जिया बल्कि संरक्षित भी किया।
मरांग गोमके जयपाल सिंह मुंडा ने संविधान सभा में कहा था कि आदिवासियों को लोकतंत्र सिखाने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि उनसे लोकतांत्रिक तरीके सीखने की जरूरत है। महात्मा गांधी की स्वतंत्र भारत की कल्पना भी गांव गणराज्यों के महासंघ पर आधारित थी, जहां सत्ता का केंद्र गांव होता।
संघर्ष, संविधान और स्वशासन का प्रश्न
आदिवासी समाज का इतिहास अपने स्वशासन और संसाधनों की रक्षा के संघर्षों से भरा हुआ है। बिरसा मुंडा, गुंडाधुर, तिलका मांझी, सिद्धू–कान्हू और टंट्या मामा जैसे संघर्षशील नायकों ने हमेशा यह मांग उठाई कि आदिवासी समाज को अपने फैसले स्वयं लेने का अधिकार मिले।
भारतीय संविधान ने भी इस ऐतिहासिक सच्चाई को स्वीकार किया। अनुच्छेद 40 के तहत ग्राम स्वशासन को मान्यता दी गई और पांचवीं अनुसूची के माध्यम से यह स्वीकार किया गया कि आदिवासी क्षेत्रों में सामान्य कानूनों को यथावत लागू करना उपयुक्त नहीं है। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने भी केंद्रीकृत सत्ता और गांव आधारित स्वशासन के बीच अंतर्विरोध की ओर संकेत किया था।
नेहरू का पंचशील और भूरिया समिति की दृष्टि
पंडित जवाहरलाल नेहरू की आदिवासी पंचशील नीति का मूल भाव यही था कि आदिवासी समाज को उसकी संस्कृति, पहचान और जीवन-पद्धति के साथ आगे बढ़ने दिया जाए। इसी सोच के तहत गठित भूरिया समिति (1994) ने ग्रामसभा को आदिवासी समाज की मूल और सर्वोच्च संस्था माना।
भूरिया समिति ने सिफारिश की थी कि अनुसूचित क्षेत्रों में जल, जंगल, जमीन और खनिज जैसे संसाधनों पर वास्तविक नियंत्रण ग्रामसभा के पास होना चाहिए। इन्हीं सिफारिशों के आधार पर पेसा कानून, 1996 अस्तित्व में आया।
कानून और जमीनी हकीकत के बीच बढ़ती खाई
हालांकि पेसा कानून ने ग्रामसभा को सर्वोच्च सत्ता के रूप में मान्यता दी, लेकिन अधिकांश राज्यों ने इसे केवल औपचारिक रूप से अपने पंचायत कानूनों में शामिल कर लिया। मजबूत, स्वतंत्र और समुदाय-केंद्रित नियम बनाने की दिशा में गंभीर प्रयास नहीं किए गए।
परिणामस्वरूप, ग्रामसभाएं कमजोर होती चली गईं, संसाधनों पर बाहरी नियंत्रण बढ़ता गया और आदिवासी समाज अपनी भूमि, संस्कृति और जीवनाधार से दूर होता गया। आज पेसा कानून आदिवासी समाज के लिए एक ऐसे अधूरे वादे का प्रतीक बन चुका है, जिसका जमीन पर उतरना अब भी बाकी है।
सवाल अब भी कायम है — क्या पेसा कानून को केवल कागज़ों से निकालकर वास्तविक स्वशासन का आधार बनाया जाएगा, या यह ऐतिहासिक कानून यूं ही उपेक्षा का शिकार बना रहेगा?
Credit: Down to earth
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