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ज़िला मुख्यालय मोहला: कागज़ों पर चमचमाता ज़िला, ज़मीन पर बुनियादी सुविधाओं के लिए तरसती जनता

 


विकास के दावों और जमीनी सच्चाई के बीच फँसा एक पूरा क्षेत्र

छत्तीसगढ़ के प्रशासनिक इतिहास में जब मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी को एक नए ज़िले के रूप में स्थापित किया गया, तब इस वनांचल और आदिवासी बहुल क्षेत्र के लोगों ने इसे सिर्फ एक प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि अपने भविष्य की नई उम्मीद के रूप में देखा था। लोगों को विश्वास दिलाया गया कि अब विकास सीधे गाँवों तक पहुँचेगा, प्रशासन जनता के करीब आएगा, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी मूलभूत सुविधाएँ मजबूत होंगी और वर्षों की उपेक्षा समाप्त होगी।

लेकिन ज़मीनी वास्तविकता आज इन उम्मीदों से बिल्कुल उलट दिखाई देती है। ज़िला बनने के बाद कागज़ों पर योजनाएँ बढ़ीं, सरकारी बोर्ड बढ़े, अफसरों की आवाजाही बढ़ी, लेकिन आम नागरिक की समस्याएँ जस की तस बनी रहीं। मोहला आज उस विडंबना का उदाहरण बन चुका है जहाँ “ज़िला मुख्यालय” का तमगा तो मिल गया, लेकिन “ज़िला स्तर की सुविधाएँ” अब भी दूर का सपना हैं।

1. प्रशासनिक चमक-दमक बनाम बुनियादी सुविधाओं की बदहाली

ज़िला बनने के बाद सबसे तेज़ बदलाव अगर कहीं दिखाई दिया, तो वह सरकारी दफ़्तरों, वाहनों और प्रशासनिक व्यवस्थाओं में दिखा। नई-नई इमारतें तैयार हुईं, कई कार्यालय खोले गए, अधिकारियों के लिए सुविधाएँ बढ़ीं और मुख्यालय का स्वरूप कागज़ों पर आधुनिक दिखाने की कोशिश की गई।

लेकिन जैसे ही कोई व्यक्ति मुख्य सड़क से अंदर मोहल्लों या ग्रामीण संपर्क मार्गों की ओर बढ़ता है, विकास की पूरी तस्वीर बिखर जाती है।

जगह-जगह टूटी सड़कें

बरसात में जलभराव और कीचड़

नालियों की सफाई का अभाव

अंधेरी गलियाँ और खराब स्ट्रीट लाइट व्यवस्था

ये सब इस बात के संकेत हैं कि विकास की प्राथमिकता आम जनता नहीं, बल्कि केवल प्रशासनिक संरचना तक सीमित रह गई है।

बिजली और पानी: मुख्यालय की सबसे बड़ी विडंबना

एक ज़िला मुख्यालय होने के बावजूद मोहला लगातार बिजली कटौती की समस्या से जूझ रहा है। हल्की बारिश या हवा के बाद घंटों ब्लैकआउट सामान्य बात बन चुकी है। गर्मियों में स्थिति और भयावह हो जाती है, जब बिजली और पानी दोनों की कमी लोगों को परेशान करती है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि जिला मुख्यालय का यह हाल है, तो दूरस्थ वनांचल क्षेत्रों की वास्तविक स्थिति कितनी गंभीर होगी?

2. “ज़िला अस्पताल” का बोर्ड, लेकिन सुविधाएँ अब भी प्राथमिक स्तर की

स्वास्थ्य सेवाओं को किसी भी नए ज़िले की रीढ़ माना जाता है। लेकिन मोहला में स्वास्थ्य व्यवस्था आज भी गंभीर संकट से गुजर रही है।

पुराने सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र को “ज़िला अस्पताल” का दर्जा तो दे दिया गया, लेकिन वास्तविक संसाधनों का विस्तार नहीं हुआ। अस्पताल की दीवारों पर नया रंग चढ़ गया, बोर्ड बदल गया, लेकिन सुविधाएँ नहीं बदलीं।

आज भी यहाँ:

विशेषज्ञ डॉक्टरों की भारी कमी है

आधुनिक मशीनें उपलब्ध नहीं हैं

गंभीर मरीजों को तत्काल रेफ़र किया जाता है

ब्लड बैंक और ICU जैसी सुविधाएँ अधूरी हैं

सोनोग्राफी और सीटी स्कैन जैसी सुविधाएँ सीमित या अनुपलब्ध हैं

स्थिति यह है कि सड़क दुर्घटना, प्रसूति जटिलता या गंभीर बीमारी की हालत में मरीजों को राजनांदगांव, दुर्ग या रायपुर भेजा जाता है।

गरीबों के लिए बीमारी एक आर्थिक आपदा

ग्रामीण और गरीब परिवारों के लिए इलाज केवल स्वास्थ्य संकट नहीं, बल्कि आर्थिक तबाही भी बन चुका है। एम्बुलेंस, निजी वाहन, दवाइयाँ और बड़े शहरों के खर्च कई परिवारों को कर्ज़ में धकेल देते हैं।

ऐसे में “ज़िला अस्पताल” शब्द केवल एक औपचारिकता बनकर रह गया है।

3. रोज़गार और उद्योग: उम्मीदों का सबसे बड़ा पतन

जब नया ज़िला बना था, तब यह कहा गया था कि इससे स्थानीय व्यापार और रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। लोगों को उम्मीद थी कि:

स्थानीय युवाओं को सरकारी अवसर मिलेंगे

छोटे उद्योग स्थापित होंगे

वनोपज आधारित उद्योग विकसित होंगे

बाज़ार और व्यापार का विस्तार होगा

लेकिन आज स्थिति बिल्कुल अलग है।

युवा आज भी पलायन को मजबूर

मोहला और आसपास के क्षेत्रों के पढ़े-लिखे युवा आज भी रोजगार के लिए बड़े शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। सरकारी नौकरियाँ सीमित हैं और निजी क्षेत्र लगभग न के बराबर है।

स्थानीय स्तर पर:

कोई बड़ा उद्योग नहीं

स्किल डेवलपमेंट का ठोस ढाँचा नहीं

स्वरोज़गार के लिए पर्याप्त सहायता नहीं

कृषि और वनोपज आधारित प्रोसेसिंग इकाइयों का अभाव

परिणामस्वरूप युवा अपने गाँव और परिवार छोड़कर नागपुर, रायपुर और अन्य शहरों की ओर जा रहे हैं।

यह पलायन केवल आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक संकट भी है।

4. प्रशासन जनता के करीब आया या और दूर चला गया?

नया ज़िला बनने के पीछे सबसे बड़ा तर्क था—“प्रशासन को जनता के करीब लाना”। लेकिन स्थानीय लोगों का अनुभव कुछ और कहानी कहता है।

पहले लोगों को राजनांदगांव जाना पड़ता था, लेकिन अब मोहला में ही दफ़्तर होने के बावजूद सुनवाई की प्रक्रिया जटिल बनी हुई है।

आम लोगों की शिकायतें:

छोटे कामों के लिए कई चक्कर

फाइलों का लंबा इंतज़ार

योजनाओं में पारदर्शिता की कमी

जनता से संवाद का अभाव

स्थानीय नागरिकों का मानना है कि प्रशासन अब जनता की समस्याओं से अधिक प्रोटोकॉल और औपचारिकताओं में व्यस्त दिखाई देता है।

5. नगर विस्तार और अव्यवस्थित शहरीकरण का संकट

मोहला तेजी से गाँव से कस्बे और कस्बे से “अधूरे शहर” में बदल रहा है। लेकिन इस परिवर्तन के साथ कोई ठोस शहरी योजना दिखाई नहीं देती।

अनियोजित निर्माण

पार्किंग की समस्या

सार्वजनिक शौचालयों की कमी

कचरा प्रबंधन का अभाव

यदि समय रहते ठोस शहरी नीति नहीं बनाई गई, तो आने वाले वर्षों में मोहला अव्यवस्थित शहरीकरण का बड़ा उदाहरण बन सकता है।

6. आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों तक विकास क्यों नहीं पहुँच पा रहा?

यह क्षेत्र मुख्यतः आदिवासी और ग्रामीण आबादी वाला इलाका है। ऐसे में विकास का सबसे बड़ा पैमाना यह होना चाहिए था कि दूरस्थ गांवों तक बुनियादी सुविधाएँ पहुँचें।

लेकिन आज भी कई गांवों में:

स्वास्थ्य सेवाएँ कमजोर हैं

शिक्षा व्यवस्था सीमित है

सड़क संपर्क अधूरा है

इंटरनेट और डिजिटल सुविधाएँ कमजोर हैं

रोजगार के साधन सीमित हैं

इससे यह सवाल उठता है कि क्या जिला निर्माण का वास्तविक लाभ उन लोगों तक पहुँचा, जिनके नाम पर यह पूरा प्रशासनिक ढाँचा बनाया गया था?

निष्कर्ष: विकास केवल भवनों से नहीं, लोगों के जीवन से मापा जाता है

मोहला की वर्तमान स्थिति यह स्पष्ट करती है कि केवल नया ज़िला बना देना ही विकास नहीं होता। विकास का वास्तविक अर्थ तब है जब:

आम नागरिक को बेहतर स्वास्थ्य सुविधा मिले

युवाओं को स्थानीय रोजगार मिले

बिजली-पानी जैसी मूलभूत सुविधाएँ स्थिर हों

ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों तक योजनाओं का लाभ पहुँचे

प्रशासन जनता के प्रति संवेदनशील बने

जब तक मोहला की आम जनता अपने जीवन में वास्तविक बदलाव महसूस नहीं करेगी, तब तक सरकारी घोषणाएँ और प्रशासनिक उपलब्धियाँ केवल कागज़ी उपलब्धियाँ ही मानी जाएँगी।

आज आवश्यकता केवल नए बोर्ड लगाने की नहीं, बल्कि ईमानदार प्रशासनिक इच्छाशक्ति, पारदर्शिता और ज़मीनी विकास की है। क्योंकि जनता अब भाषण नहीं, बदलाव देखना चाहती है।

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