जिले भर में छत्तीसगढ़ के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी शहीद वीर नारायण सिंह का शहादत दिवस श्रद्धा, सम्मान और सामाजिक चेतना के साथ मनाया गया। इसी कड़ी में 10 दिसंबर को जिला स्तरीय कार्यक्रम मोहला स्थित गोंडवाना भवन में सर्व आदिवासी समाज के तत्वावधान में आयोजित किया गया।
वहीं शुक्रवार 19 दिसंबर को ग्राम एकटकन्हार में केंद्र स्तर पर भी गोंड समाज द्वारा शहीद वीर नारायण सिंह शहादत दिवस का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत शीतला माता मंदिर से मांदरी नृत्य के साथ निकाली गई भव्य शोभायात्रा से हुई, जो गोंडवाना भवन पहुंचकर संपन्न हुई। वहां विधिवत पूजा-अर्चना के बाद सांस्कृतिक एवं मंचीय कार्यक्रम आयोजित किए गए।
कार्यक्रम में वक्ताओं ने शहीद वीर नारायण सिंह के संघर्ष, बलिदान और विचारों को याद करते हुए आने वाली पीढ़ियों को उनसे प्रेरणा लेने का संदेश दिया। उनकी वीर गाथा को नमन करते हुए सामाजिक एकता, अधिकारों की रक्षा और सांस्कृतिक चेतना पर जोर दिया गया। आयोजन में जिले भर से सामाजिक पदाधिकारी तथा बड़ी संख्या में ग्रामीणजन उपस्थित रहे।
छत्तीसगढ़ के पहले स्वतंत्रता सेनानी
वक्ताओं ने बताया कि सोनाखान (जिला बलोदा बाजार–बिलाईगढ़) के ज़मींदार वीर नारायण सिंह को छत्तीसगढ़ का पहला स्वतंत्रता संग्राम सेनानी माना जाता है। वे अन्याय के विरुद्ध खड़े होने वाले, गरीबों के हितैषी और साहसी योद्धा थे।वर्ष 1856–57 के अकाल के दौरान जब अंग्रेज समर्थित व्यापारी अनाज छिपाकर महंगे दामों पर बेच रहे थे, तब वीर नारायण सिंह ने उनके गोदामों से अनाज निकलवाकर भूखे गरीबों में बांट दिया। इसी मानवीय विद्रोह ने उन्हें “छत्तीसगढ़ का रॉबिनहुड” बनाया।
अंग्रेजी सत्ता से सीधी टक्कर लेने वाले इस महान क्रांतिकारी को अंततः 1857 में रायपुर में फांसी दे दी गई, लेकिन उनका बलिदान आज भी जनमानस में जीवित है।
समाज को दिशा देने वाले विचार
कार्यक्रम में विभिन्न विषयों पर वक्ताओं ने समाज को मार्गदर्शन दिया। सर्व आदिवासी समाज के जिला अध्यक्ष संजीत ठाकुर ने वीर नारायण सिंह की जीवनी और बलिदान को स्मरण करते हुए कहा कि आदिवासी समाज की रीति-नीति, भाषा और संस्कृति ही उसकी पहचान है। यदि बोली-बानी और परंपराएं समाप्त होंगी तो संविधान में आदिवासियों को मिले अधिकार और आरक्षण भी खतरे में पड़ सकते हैं। उन्होंने आधुनिकता के साथ चलते हुए भी अपनी मूल संस्कृति को न छोड़ने का आह्वान किया।
उन्होंने पेसा कानून (1996) का उल्लेख करते हुए कहा कि 24 दिसंबर को पेसा दिवस मनाने के लिए सरकार द्वारा प्रचार-प्रसार के निर्देश पांचवीं अनुसूची क्षेत्र के कलेक्टरों दिए गए हैं, लेकिन पंचायतों तक अब तक इसकी सूचना नहीं पहुंची है, जो चिंताजनक है।
आर्थिक आत्मनिर्भरता पर जोर
सेवानिवृत्त मुख्य वित्तीय नियंत्रक तिलक सोरी ने वित्तीय प्रबंधन, शिक्षा, स्वास्थ्य और अधिकारों पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि हर परिवार को दैनिक और मासिक खर्चों का हिसाब रखना चाहिए। रोजगार के क्षेत्र में कृषि, बढ़ईगिरी, सिलाई, राशन दुकान, हाउसकीपिंग जैसे स्थानीय कार्यों को अपनाकर स्थानीय स्तर पर ही रोजगार सृजित किया जा सकता है। सरकार की नौकरियां सीमित हैं, इसलिए स्वयं का व्यवसाय शुरू करना समय की आवश्यकता है।
उन्होंने ग्राम सभा की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते हुए ग्रामीणों से योजनाओं के क्रियान्वयन पर जनप्रतिनिधियों से सवाल पूछने और अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होने की अपील की। शिक्षा के संदर्भ में उन्होंने मोबाइल के सही उपयोग पर बल देते हुए कहा कि इसका सदुपयोग कर छात्र-छात्राएं आगे बढ़ सकते हैं, जबकि दुरुपयोग से भविष्य प्रभावित हो रहा है।
सामाजिक परिवर्तन की कहानी
गोंड समाज ब्लॉक अध्यक्ष मोहला रमेश हिडामे ने समाज की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और शैक्षणिक स्थिति पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि वर्ष 2010 में कराए गए एक सर्वे में 56 हजार की आबादी में केवल 1200 लोग ही 12वीं पास थे और स्नातकों की संख्या भी बेहद कम थी। खेती योग्य जमीन होने के बावजूद कई घरों में अनाज तक नहीं था।
इस स्थिति से निपटने के लिए समाज ने शिक्षा, रोजगार, राजनीति और कृषि को लेकर लगातार प्रयास किए, जिसके सकारात्मक परिणाम आज दिखाई दे रहे हैं।
कार्यक्रम का समापन शहीद वीर नारायण सिंह के आदर्शों पर चलने और समाज को संगठित, शिक्षित एवं आत्मनिर्भर बनाने के संकल्प के साथ हुआ।
कार्यक्रम में संभाग स्तरीय गोंड समाज मोहला के समस्त पदाधिकारियों के साथ साथ बड़ी तादाद में ग्रामीण मौजूद रहे।
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