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“मानपुर के भर्रीटोला स्कूल से शिक्षक हटाकर दफ्तर भेजा, परीक्षा के बीच बच्चों का भविष्य संकट में” की

NBPNEWS/मोहला_मानपुर, 25 सितंबर 2025 : जिले का आदिवासी बाहुल्य धुर नक्सल प्रभावित मानपुर विकासखंड की कई स्कूलें दशकों से विषयवार अध्यापकों के लिए आंसू बहा रही है। इन स्कूलों में बिगड़ी हुई अध्यापन व्यवस्था को अध्यापकों की पूर्ति कर सुधारने के बजाय शिक्षा विभाग अपनी कारगुज़ारियों से बिगड़ी व्यवस्था को तबाही की ओर ले जाने में आमादा है। वहीं दूसरी ओर जिला प्रशासन सब जानकर भी तमाशबीन बना हुआ है।

बच्चों के अध्यापन से खिलवाड़ - दो माह भी नहीं पढ़ाया बच्चों को और दफ्तर में अटैच,

      ताजा मामला मानपुर विकासखंड अंतर्गत भर्रीटोला स्थित हायर सेकेंडरी स्कूल का है। वर्षों से इस स्कूल में वाणिज्य संकाय के विषय व्याख्याता की कमी थी। हाल ही में यहां जरूरतमंद विषय के व्याख्याता की नियुक्ति हुई थी और बच्चों को बेहतर अध्यापन का लाभ मिला था। लेकिन जिला शिक्षा अधिकारी के कारनामे ने बच्चों से उनका ये व्याख्याता शिक्षक उनसे छीन लिया। वाणिज्य संकाय के उक्त व्याख्याता विकास कुमार देवांगन को पदस्थापना के महज दो माह के भीतर ही स्कूल से हटाकर जिला समग्र शिक्षा दफ्तर में अटैच कर दिया गया। बच्चों की अध्यापन व्यवस्था और उनकी जरूरत को जानते हुए भी उनके भविष्य से खिलवाड़ करते हुए डी ई ओ ने द्वारा इस हेतु लिखित आदेश जारी कर दिया गया। डी ई ओ के आदेश के परिपालन में भर्रीटोला हायर सेकेंडरी स्कूल प्रबंधन द्वारा उक्त व्याख्याता को स्कूल से रिलीफ भी कर दिया गया।

        डी ई ओ की भूमिका पर सवाल ,परीक्षा के बीच बच्चों से छीन गया उनका शिक्षक

जिस वक्त उक्त व्याख्याता को डी ई ओ फ़त्तेराम कोसरिया के लिखित आदेश के परिपालन में स्कूल से हटाकर समग्र शिक्षा दफ्तर के काम पर लगाने के लिए रिलीफ किया गया उस समय उक्त स्कूल में अर्ध वार्षिक परीक्षा चल रही थी। बच्चों को पढ़ाने के लिए शासन से तनख्वाह पाने वाले शिक्षक को अध्यापन कार्य से हटाकर दफ्तर की बाबूगिरी में लगाना उस पर एन परीक्षा के बीच बच्चों से उनका शिक्षक छीन लेना शिक्षा विभाग की घोर लापरवाही व संवेदनहीनता को उजागर करता है। वहीं शिक्षा विभाग के इस कारनामे से डी ई ओ की भूमिका पर यह सवाल उठना लाज़मी है कि जिला शिक्षा अधिकारी को जिले की शिक्षा व्यवस्था नौनिहालों के भविष्य की कोई चिंता है कि नहीं ? 

प्रशासन तत्काल स्कूल को वापस लौटाए शिक्षक को, जिम्मेदारों पर हो कार्यवाही_ देवानंद 

      इधर मानपुर जनपद पंचायत के उपाध्यक्ष व ब्लॉक शिक्षा समिति अध्यक्ष देवानंद कौशिक ने भी शिक्षा विभाग के इस कारनामे को संवेदनहीन कार्यशैली बताया है। उन्होंने स्कूल से जिला मुख्यालय अटैच किए गए व्याख्या शिक्षक को तत्काल वापस स्कूल के अध्यापन कार्य में संलग्न करने की मांग प्रशासन से करते हुए कहा है कि स्कूल प्रबंधन बिल्कुल नहीं चाह रहा था कि स्कूल के शिक्षक को अन्यत्र अटैच किया जाए क्योंकि इससे अध्यापन व्यवस्था बिगड़ेगी। लेकिन जिला शिक्षा अधिकारी ने प्राचार्य पर शिक्षक को रिलीफ करने का दबाव बनाया। जिसके चलते शिक्षक को रिलीफ कर दिया गया। और अध्यापन व्यवस्था बिगड़ गई। देवानंद कौशिक ने यह भी कहा है कि अध्यापन व्यवस्था बिगाड़ने वाले जिम्मेदार अधिकारी पर कड़ी कार्यवाही हो। यदि तत्काल शिक्षक की स्कूल वापसी और जिम्मेदार अधिकारी पर कार्यवाही नहीं हुई तो निकट भविष्य में इसके लिए उग्र आंदोलन किया जाएगा।

कलेक्टर की चुप्पी, अधर में आदिवासी शिक्षा, शिक्षा व्यवस्था का बेड़ागर्क, 

         इधर शिक्षा अधिकारी अपनी कारगुज़ारियों और मनमानी से आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र की शिक्षा व्यवस्था का बेड़ागर्क करने पर तुले हुए हैं। दूसरी ओर जिला प्रशासन आदिवासी नौनिहालों के भविष्य से खिलवाड़ का तमाशबीन बना हुआ है। कलेक्टर की इस पर चुप्पी समझ से परे है। इस तरह की ये कोई पहला मसला नहीं है अटैचमेंट के जरिए अध्यापकों को अन्यत्र काम में लगाकर बच्चों की अध्यापन व्यवस्था पर आघात करने का कारनामा शिक्षा विभाग की परंपरा बनी हुई है। जिले के जिला शिक्षा अधिकारी ही यदि अध्यापन व्यवस्था से खिलवाड़ करने पर अमादा हो तो कलेक्टर से उम्मीद बनती है कि शिक्षा अधिकारी को कार्यवाही का सबक सिखाकर व्यवस्था को सम्हाले। लेकिन यदि कलेक्टर ही सब कुछ जानकर भी कोई कार्यवाही न करे और मौन साधे रहे तो इससे न केवल उम्मीदें हार जाती है बल्कि इससे शिक्षा व्यवस्था का बेड़ागर्क ही नहीं बल्कि पतन हो जाना संभावित है। ऐसी ही विडंबना के दौर से इन दिनों जिले की व्यवस्था जूझने को मजबूर है।

वाह रे सिस्टम_ दफ्तर का काम निपटाने दांव पर लगा दी शिक्षा......! ये कैसा सुशासन ?

        जिला शिक्षा अधिकारी पत्तेराम कोसरिया द्वारा जारी लिखित आदेश में उल्लेख है कि जिले की समग्र शिक्षा शाखा में कार्य किए जाने एवं समय_समय पर कार्यालय द्वारा सौंपे गए दायित्वों का निर्वहन करने के लिए आपको आदेशित किया जाता है। दूरभाष पर भी उन्होंने कहा कार्यालयीन कार्य संपादन के लिए उक्त शिक्षक को कार्यालयीन कार्य में लगाया गया है। अब यहां सवाल ये उठता है एक शिक्षक को उनके मूल कार्य अध्यापन से हटाकर दफ्तर के बाबू काम में लगाना क्या उचित है। सवाल ये भी बड़ा है कि दफ्तर के काम निपटाने के लिए स्कूल की शिक्षा व्यवस्था को दांव पर लगाकर स्कूली बच्चों के अध्यापन और उनके भविष्य से खिलवाड़ किया जाना... ये कैसा सिस्टम और सुशासन है ?

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