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पेसा कानून और ग्रामसभा के अधिकारों की अनदेखी? वन विभाग के खिलाफ 106 गांव के आदिवासी समाज ने निकली रैली

NBP NEWS/ मानपुर/ प्रवेश कुमार, 09 सितंबर
आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र मानपुर में वन विभाग की कथित प्रताड़ना और मनमानी के खिलाफ सर्व आदिवासी समाज का आक्रोश सामने आया। क्षेत्र की 106 ग्रामों से बड़ी संख्या में आदिवासी महिला-पुरुष मंगलवार को मानपुर में एकत्रित हुए। गोड़वाना भवन में बैठक के बाद ग्रामीणों ने वन विभाग के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन करते हुए रैली निकाली और अपनी मांगों को लेकर प्रशासन को ज्ञापन सौंपा।

प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि वन विभाग द्वारा आदिवासी समाज के लोगों को लगातार परेशान किया जा रहा है और उन्हें जंगल से बेदखल करने की साजिश की जा रही है। ग्रामीणों का कहना है कि आदिवासी समुदाय का जीवन जल, जंगल और जमीन पर आश्रित रहा है। पीढ़ियों से जंगल को बचाने और संवारने का काम समाज के लोगों ने किया है, लेकिन अब उन्हीं लोगों को जंगल से बेदखल करने की कोशिश की जा रही है।

प्रशासनिक अमले और वन विभाग के खिलाफ जताया विरोध

ग्रामीणों के मुताबिक 106 गांवों से आए सैकड़ों आदिवासी महिला-पुरुषों ने मानपुर के गोड़वाना भवन में सुबह करीब 11 बजे बैठक की। इसके बाद पैदल मार्च करते हुए वन विभाग कार्यालय पहुंचे। इस दौरान वन विभाग और प्रशासनिक व्यवस्था के खिलाफ जमकर नारेबाजी की गई।

प्रदर्शनकारियों ने प्रदेश के वन मंत्री के नाम एसडीओ के माध्यम से ज्ञापन सौंपा। समाज के प्रतिनिधियों ने कहा कि आदिवासी समाज की समस्याओं और अधिकारों को गंभीरता से लिया जाना चाहिए तथा वन विभाग की कथित मनमानी पर तत्काल रोक लगाई जानी चाहिए।

झूठे मामलों में फंसाने की धमकी का आरोप

सर्व आदिवासी समाज ने ज्ञापन के माध्यम से आरोप लगाया कि ग्रामीणों को प्रताड़ित करने और पेसा कानून का उल्लंघन करने वाले वन कर्मचारियों के खिलाफ तत्काल दंडात्मक कार्रवाई की जाए। साथ ही सामुदायिक वन अधिकारों का सम्मान करते हुए कथित मनमानी पर रोक लगाने की मांग की गई।

समाज के प्रतिनिधियों ने चेतावनी दी कि यदि उनकी मांगों पर जल्द कार्रवाई नहीं की गई तो आने वाले दिनों में क्षेत्र में बड़ा आंदोलन और चक्काजाम किया जाएगा।

पेसा कानून और ग्रामसभा के अधिकारों की अनदेखी का आरोप

ग्रामीणों ने वन विभाग पर वन अधिकार संबंधी प्रावधानों और पेसा कानून की व्यवस्था की अनदेखी करने का आरोप लगाया। उनका कहना है कि सामुदायिक वन संसाधन अधिकारों को नजरअंदाज करते हुए स्थानीय प्रशासन और ग्रामसभा की अनुमति के बिना क्षेत्र में निर्माण कार्य कराए जा रहे हैं।

ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया कि ग्रामसभा की बिना सहमति के संवेदनशील जंगलों में नाली निर्माण जैसे कार्य किए गए। इसके अलावा आदिवासियों और बच्चों के दैनिक उपयोग वाले पारंपरिक खेल मैदानों पर जबरन पौधे लगाने का भी आरोप लगाया गया।

समाज के लोगों का कहना है कि जंगलों को तारों से घेरकर आदिवासियों की आवाजाही पर रोक लगाने की कोशिश की जा रही है। इससे उनके पारंपरिक जीवन और जंगल पर निर्भरता प्रभावित हो रही है।

“वन विभाग हमें डरा-धमका रहा है”

प्रदर्शन के दौरान आयोजित सभा को संबोधित करते हुए आदिवासी समाज के प्रतिनिधि भोजेश शाह मंडावी ने वन विभाग के रवैये पर नाराजगी जताई। उन्होंने आरोप लगाया कि विभाग के कर्मचारी ग्रामीणों को डरा-धमका रहे हैं और जंगलों की जमीन खाली कराने का दबाव बनाया जा रहा है।

उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज पीढ़ियों से जंगलों में रहकर अपनी आजीविका चला रहा है। लंबे समय से वन विभाग की ओर से ग्रामीणों के साथ कथित दबाव और कार्रवाई की स्थिति बनी हुई है। प्रदर्शनकारियों ने स्पष्ट किया कि ग्रामीणों को जबरन बेदखल करने की किसी भी कोशिश का विरोध किया जाएगा।

वन विभाग एस डी ओ सुरेश पिपरे ने बताया कि आदिवासी समाज ज्ञापन सौंप कर सीपीटी नाली निर्माण और फेंसिंग कार्यों पर रोक लगाने की मांग की गई है। शारदा, डोमिकला, हालेपायली और सीतागांव को वन अधिकार पत्रक दिया जाए। साथ ही अतिक्रमण कर खेती कर रहे किसानों को न हटाया जाए। कुछ बीटगार्ड की ट्रांसफर की मांग की गई है।उच्च कार्यालय को अवगत कराकर निर्देशानुसार कार्यवाही की जाएगी।

कार्रवाई नहीं हुई तो आंदोलन तेज करने की चेतावनी

सर्व आदिवासी समाज ने प्रशासन से मांग की कि ग्रामीणों की शिकायतों की निष्पक्ष जांच कराई जाए, झूठे मामलों में फंसाने या धमकाने के आरोपों की जांच हो तथा पेसा कानून और ग्रामसभा के अधिकारों का पालन सुनिश्चित किया जाए।

समाज ने चेतावनी दी कि यदि शासन-प्रशासन ने उनकी मांगों पर शीघ्र ध्यान नहीं दिया तो आने वाले दिनों में बड़े आंदोलन और चक्काजाम का रास्ता अपनाया जाएगा।


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