आदिवासी समाज के इतिहास में लाल श्याम शाह का नाम एक ऐसे जुझारू और बेबाक नेता के रूप में दर्ज है, जिन्होंने अपने अधिकारों के लिए न केवल आवाज उठाई बल्कि सिद्धांतों के लिए पद तक त्याग दिया। उनका जीवन संघर्ष, स्वाभिमान और समाज सेवा का प्रतीक रहा है।
मोहला क्षेत्र के पानाबरस गांव में एक जमींदार परिवार में 1 मई 1919 को जन्मे लाल श्याम शाह ने संपन्न जीवन छोड़कर आदिवासी और कमजोर वर्ग के लोगों के हक की लड़ाई को अपना लक्ष्य बनाया। वे जल, जंगल और जमीन के अधिकारों के लिए लगातार संघर्षरत रहे और समाज के बीच एक मजबूत नेतृत्व के रूप में उभरे।
उनके जीवन का सबसे उल्लेखनीय प्रसंग तब सामने आया, जब वे सांसद बने। संसद पहुंचने के बाद उन्होंने आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों के लिए अलग राज्य बनाने की मांग उठाई। लेकिन जब उनकी इस मांग पर कोई सुनवाई नहीं हुई, तो उन्होंने पद का मोह त्यागते हुए इस्तीफा दे दिया। बताया जाता है कि उनका कार्यकाल भले ही 10 दिनों का रहा, लेकिन वे संसद में केवल एक दिन ही उपस्थित रहे।
इस्तीफा देते समय उन्होंने एक पत्र भी लिखा, जिसमें स्पष्ट शब्दों में कहा—
“आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र को गोंडवाना राज्य का दर्जा दिया जाए। जब नए राज्य सांस्कृतिक, भौगोलिक व ऐतिहासिक आधार पर बनाए जा रहे हैं, तो हमारी गोंडवाना प्रांत की मांग की उपेक्षा क्या घोर अन्याय नहीं है?”
उनकी इस बेबाकी और सिद्धांतों के प्रति प्रतिबद्धता ने उन्हें एक अलग पहचान दी। ग्रामीण आज भी उनकी स्मृति को जीवित रखने के लिए क्षेत्र में उनकी प्रतिमाएं स्थापित कर रहे हैं, जो उनके संघर्ष और त्याग की कहानी बयां करती हैं।
लाल श्याम शाह का संघर्ष केवल राजनीतिक नहीं था, बल्कि सामाजिक जागरूकता और एकता को मजबूत करने की दिशा में भी था। वे मानते थे कि आदिवासी समाज की असली ताकत उसकी संस्कृति, परंपरा और प्रकृति से जुड़ी जीवनशैली में निहित है।
पानाबरस राज में 7- 14 की परम्परा को लेकर लगातार समाज को एकजुट करते रहे। इस अनूठी परम्परा जो शादी, छट्ठी, मरनी, देव नीति में दिखता है। उसे संजोकर रखने में समय लगाया और आने वाले पीढ़ी को भी प्रेरित किया। आज भी लाल श्याम शाह के पद चिन्हों पर जीवन की अटूट परम्परा बन चुकी 7 - 14 की व्यवस्था को बचाने समाज संघर्षरत है।
10 मार्च 1988 को उनका निधन हो गया, लेकिन जिस अलग राज्य की मांग को लेकर उन्होंने आवाज उठाई थी, वह उनकी मृत्यु के लगभग 12 साल बाद पूरी हुई। हालांकि वे उस पल के साक्षी नहीं बन सके, लेकिन उनका संघर्ष आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बन गया।
आज भी लाल श्याम शाह को आदिवासी समाज एक ऐसे योद्धा के रूप में याद करता है, जिसने अपने हक की लड़ाई के लिए सत्ता तक को ठुकरा दिया। उनका जीवन यह संदेश देता है कि सच्चा नेतृत्व वही है, जो समाज के हितों को सर्वोपरि रखे। सतत 7 - 14 अमूल्य परम्परा को आगे बढ़ाते रहे।
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