आदिवासी बाहुल्य जिला मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी में शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक बेहद गंभीर मामला सामने आया है। जिला मुख्यालय मोहला स्थित पीएम श्री स्वामी आत्मानंद स्कूल में बच्चों के एडमिशन के बदले कथित रूप से स्कूल सामग्री मांगने के आरोप लगे हैं। आरोप है कि कहीं चटाई, कहीं सीलिंग फैन तो कहीं ए4 साइज कॉपियर पेपर की बंडल की मांग की गई।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस स्कूल से महज कुछ दूरी पर जिला शिक्षा अधिकारी का कार्यालय है और जहां जिले के तमाम आला अधिकारी एवं जनप्रतिनिधि मौजूद रहते हैं, वहां यदि एडमिशन के नाम पर इस तरह की कथित मांग हो रही है, तो शिक्षा विभाग की निगरानी व्यवस्था आखिर कहां है?
विधवा महिला से चटाई मांगने का आरोप
मामले में सामने आए एक कथित प्रकरण ने पूरे मामले को और गंभीर बना दिया है। आरोप के मुताबिक, एक विधवा महिला से उसके बच्चे के एडमिशन के नाम पर ग्रीन मैट/चटाई की व्यवस्था करने को कहा गया।
बताया गया कि महिला की दैनिक आमदनी करीब 200 रुपये है। बच्चे के भविष्य और अच्छी शिक्षा की उम्मीद में महिला ने अपनी जमा पूंजी (गुल्लक तोड़कर) से किसी तरह व्यवस्था कर स्कूल की मांग पूरी की।
परिजनों का आरोप है कि एडमिशन की तारीख निकल जाने का हवाला देकर वाशु देव देवांगन द्वारा पहले बच्चे का प्रवेश नहीं लेने की बात कही गई। इसके बाद कथित रूप से यह कहा गया कि संबंधित अधिकारियों और प्राचार्य सीमा वर्मा से बात कर एडमिशन का रास्ता निकाला गया है, इसलिए परिवार को कुछ ‘सहयोग’ करना होगा। लेकिन बच्चे के एडमिशन होने के 15 दिवस बाद ये मांग की गई।
आरोप है कि इसी ‘सहयोग’ के नाम पर चटाई अथवा सीलिंग फैन उपलब्ध कराने को कहा गया।
दूसरे मामले में 15 बंडल कॉपियर पेपर की मांग का आरोप
इसी तरह एक अन्य मामले में बच्चे के एडमिशन के नाम पर ए4 साइज कॉपियर पेपर की 15 बंडल की मांग किए जाने का आरोप है।
परिजन के मुताबिक, बच्चे का एडमिशन कराने के लिए परिवार ने किसी तरह स्कूल की कथित मांग पूरी की।
इसके अलावा सूत्रों के हवाले से यह भी जानकारी सामने आ रही है कि अलग-अलग विद्यार्थियों से कथित तौर पर कुर्सी सहित अलग-अलग स्कूल सामग्री उपलब्ध कराने को कहा गया है।
‘सहयोग’ या एडमिशन की कीमत?
पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि किसी सरकारी स्कूल में एडमिशन के लिए निर्धारित शुल्क के अलावा बच्चों के परिवारों से चटाई, पंखा, कॉपियर पेपर या कुर्सी जैसी सामग्री उपलब्ध कराने को कहा जा रहा है, तो इसकी आधिकारिक अनुमति किसने दी?
यदि स्कूल को वास्तव में किसी सामग्री की आवश्यकता है, तो क्या उसके लिए विभागीय स्तर पर कोई लिखित आदेश, प्रस्ताव या स्वीकृत व्यवस्था है?
और यदि ऐसी कोई आधिकारिक व्यवस्था नहीं है, तो फिर अभिभावकों से व्यक्तिगत रूप से सामग्री की मांग किस अधिकार के तहत की जा रही है?
शाला समिति भी अब तक इस विषय को लेकर कोई सार्थक पहल नहीं की है, सूत्रों की माने तो शाला समिति के सदस्यों को इसकी जानकारी है लेकिन एक मीटिंग इंतजार कर रहे हैं। ऐसे में क्या गंभीर मामले में शाला समिति स्वत संज्ञान लेकर कार्यवाही नहीं कर सकती। क्या बैठक का इंतजार करना पड़ेगा या क्या खुद से ही आपात बैठक भी बुला सकते। शाला समिति के अध्यक्ष की भूमिका भी अब तक समझ से परे है।
शिकायत करने से डर रहे हैं अभिभावक!
इस पूरे मामले का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि कई अभिभावक खुलकर सामने आने से बच रहे हैं।
पीड़ित परिवारों का कथित तौर पर कहना है कि उन्हें डर है कि यदि उन्होंने एडमिशन के नाम पर कथित मांग के खिलाफ आवाज उठाई तो उनके बच्चों के साथ स्कूल में भेदभाव किया जा सकता है, टीसी काटी जा सकती है या पढ़ाई एवं परीक्षा के दौरान उन्हें परेशान किया जा सकता है।
यदि यह डर वास्तव में अभिभावकों के बीच मौजूद है, तो यह केवल कथित वसूली का मामला नहीं बल्कि स्कूल में भयमुक्त एवं समान शिक्षा के अधिकार पर भी गंभीर सवाल खड़ा करता है।
कलेक्टर ने दिए जांच के निर्देश
मीडिया द्वारा मामले की जानकारी देते ही उक्त विषय पर जिला शिक्षा अधिकारी को जांच के निर्देश दिए हैं।
प्राचार्य और कर्मचारी की भूमिका पर भी सवाल
परिजनों के आरोपों में स्कूल की प्राचार्य की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं। आरोप है कि प्राचार्य सीमा वर्मा के निर्देश पर एक कर्मचारी, जिन्हें परिजनों द्वारा वासु देव देवांगन सर के रूप में बताया गया है, एडमिशन से जुड़े कथित लेनदेन और सामग्री की मांग का काम संभाल रहे थे।
इसीलिए अब सबसे जरूरी है कि जिला शिक्षा विभाग पूरे मामले की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच कराए और यह स्पष्ट करे कि क्या वास्तव में एडमिशन के बदले अभिभावकों से किसी प्रकार की सामग्री अथवा आर्थिक लाभ की मांग की गई थी।
पीएम श्री स्कूल पर भी उठ रहा सवाल
स्वामी आत्मानंद स्कूल के पीएम श्री स्कूल के रूप में चयन के बाद केंद्र एवं राज्य स्तर से स्कूलों के विकास और बेहतर शैक्षणिक सुविधाओं पर जोर दिया जा रहा है। ऐसे में यदि उसी स्कूल में बच्चों के एडमिशन के नाम पर अभिभावकों से कथित रूप से सामग्री मांगे जाने के आरोप सामने आते हैं, तो यह व्यवस्था की पारदर्शिता पर बड़ा सवाल है।
पीएम श्री योजना का उद्देश्य स्कूलों को बेहतर सुविधाओं और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का मॉडल बनाना है। ऐसे में यदि एडमिशन के लिए गरीब अभिभावकों को अपनी जेब से चटाई, पंखा या कॉपियर पेपर उपलब्ध कराने की कथित मजबूरी पैदा हो रही है, तो यह पूरे सिस्टम के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
जिला शिक्षा अधिकारी से NBP NEWS के सवाल
1. क्या पीएम श्री स्वामी आत्मानंद स्कूल में एडमिशन के लिए किसी विद्यार्थी से चटाई, सीलिंग फैन, कुर्सी या कॉपियर पेपर मांगा जा सकता है?
2. क्या इस संबंध में विभाग की ओर से कोई लिखित आदेश जारी किया गया है?
3. यदि आदेश नहीं है तो अभिभावकों से ऐसी सामग्री मांगने की अनुमति किसने दी?
4. क्या स्कूल में एडमिशन से संबंधित शिकायतों की जांच कराई जाएगी?
5. क्या संबंधित अभिभावकों एवं विद्यार्थियों के बयान दर्ज किए जाएंगे?
6. क्या स्कूल के रिकॉर्ड, एडमिशन प्रक्रिया और संबंधित कर्मचारियों की भूमिका की जांच होगी?
7. यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो जिम्मेदार लोगों पर क्या कार्रवाई की जाएगी?
अब कार्रवाई की बारी जिला प्रशासन की
जिला मुख्यालय में ही कलेक्टर, जिला शिक्षा अधिकारी सहित प्रशासनिक अधिकारी और जनप्रतिनिधि मौजूद हैं। ऐसे में उनके कार्यालयों से कुछ दूरी पर संचालित एक सरकारी स्कूल में यदि एडमिशन के नाम पर इस तरह की कथित मांग की जा रही है, तो यह केवल स्कूल प्रशासन का मामला नहीं रह जाता।
अब निगाहें जिला शिक्षा विभाग और जिला प्रशासन पर हैं।
जरूरत है कि शिकायतों को दबाने के बजाय उनकी निष्पक्ष जांच हो, अभिभावकों की पहचान और उनके बच्चों के हितों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए तथा यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो जिम्मेदार लोगों पर ऐसी कार्रवाई हो जो भविष्य में किसी गरीब परिवार को अपने बच्चे के एडमिशन के लिए अपना पेट काटकर स्कूल सामग्री देने को मजबूर न करे।
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