मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी जिले की जिला पंचायत अध्यक्ष नम्रता सिंह जैन के अनुसूचित जनजाति (गोंड) जाति प्रमाण पत्र को लेकर चल रहे विवाद में उच्च स्तरीय छानबीन समिति के निर्णय से पहले आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो गया है। लगातार विवेक सिंह और सर्व आदिवासी समाज के बयान, न्यूज और सोशल मीडिया में आने के बाद नम्रता सिंह जैन के समर्थकों की ओर से सोशल मीडिया पर, 7 अगस्त को विक्ट्री साइन वाली फोटो व जीत की बधाईयां के बाद सामने आ रहे भावनात्मक एवं राजनीतिक बयानों पर शिकायतकर्ता विवेक सिंह ने कड़ा पलटवार करते हुए कहा है कि मामला किसी व्यक्ति अथवा परिवार के विरोध का नहीं, बल्कि अनुसूचित जनजाति वर्ग के संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा हुआ है।
शिकायतकर्ता पक्ष ने अपने बयान में दावा किया है कि उसके द्वारा उठाए गए सभी प्रमुख सवाल शासकीय दस्तावेजों, RTI से प्राप्त अभिलेखों और प्रस्तुत शपथ-पत्रों पर आधारित हैं। शिकायतकर्ता के मुताबिक, 7 अगस्त 2026 को उच्च स्तरीय छानबीन समिति के समक्ष 86 पृष्ठों के दस्तावेजी साक्ष्य भी ऑन-रिकॉर्ड प्रस्तुत किए जा चुके हैं।
सर्विस बुक में ओडिशा का स्थायी पता होने का दावा
शिकायतकर्ता पक्ष ने स्वर्गीय नारायण सिंह, पूर्व IAS अधिकारी, से संबंधित सर्विस बुक का हवाला देते हुए दावा किया है कि RTI के माध्यम से प्राप्त सर्विस बुक के मुख्य पृष्ठ के कॉलम-4 में उनके पिता स्वर्गीय खेत्र मोहन सिंह का स्थायी निवास ग्राम झारबेल्डा, जिला क्योंझर, ओडिशा दर्ज है।
शिकायतकर्ता का कहना है कि यह कोई अफवाह या सोशल मीडिया पर आधारित दावा नहीं, बल्कि शासकीय अभिलेख में दर्ज जानकारी है। इसी आधार पर उन्होंने सवाल उठाया है कि संबंधित परिवार की मूल निवास स्थिति आखिर किस राज्य से निर्धारित होती है और अनुसूचित जनजाति के आरक्षण संबंधी दावे का संवैधानिक आधार क्या है।
मूल निवास को लेकर उठाए सवाल
शिकायतकर्ता विवेक सिंह ने यह भी सवाल उठाया है कि अनावेदिका का मूल निवास आखिर औंधी, मोहला, रायपुर या ओडिशा में से किस स्थान को माना जाए। उनका आरोप है कि मूल निवास को लेकर स्पष्ट स्थिति सामने आए बिना वर्ष 2018 में ग्राम पंचायत मोहला से कथित प्रस्ताव किस आधार पर तैयार कराया गया।
शिकायतकर्ता पक्ष ने यह भी दावा किया है कि तत्कालीन उपसरपंच के शपथ-पत्र में कथित ग्राम पंचायत दस्तावेज को लेकर गंभीर आपत्तियां दर्ज हैं। हालांकि इन आरोपों की अंतिम वैधानिक पुष्टि संबंधित जांच और सक्षम प्राधिकारी के निर्णय के बाद ही होगी।
1950 के पूर्व के साक्ष्यों को लेकर बड़ा सवाल
जाति प्रमाण पत्र विवाद में शिकायतकर्ता पक्ष ने संविधान के अनुच्छेद 342 और राष्ट्रपति के अनुसूचित जनजाति आदेश का हवाला देते हुए दावा किया है कि अनुसूचित जनजाति की संवैधानिक स्थिति निर्धारित करने के लिए ऐतिहासिक एवं पैतृक दस्तावेज महत्वपूर्ण हैं।
शिकायतकर्ता का आरोप है कि अनावेदिका पक्ष वर्ष 1950 से पहले छत्तीसगढ़ क्षेत्र में अपने परिवार के निवास से संबंधित पर्याप्त राजस्व अभिलेख प्रस्तुत नहीं कर सका है। इसी आधार पर उन्होंने सवाल उठाया है कि यदि पूर्ववर्ती अभिलेख उपलब्ध नहीं हैं तो अनुसूचित जनजाति प्रमाण पत्र के दावे का आधार क्या है।
हालांकि, किस दस्तावेज को अनिवार्य साक्ष्य माना जाएगा और प्रमाण पत्र वैध है या नहीं, इसका अंतिम निर्णय संबंधित वैधानिक समिति एवं सक्षम प्राधिकारी द्वारा ही किया जाना है।
2013 के कानून और पुराने परिपत्रों को लेकर विवाद
शिकायतकर्ता पक्ष ने छत्तीसगढ़ के सामाजिक प्रास्थिति प्रमाणीकरण अधिनियम, 2013 का उल्लेख करते हुए कहा है कि राज्य में वर्तमान वैधानिक व्यवस्था लागू होने के बाद पुराने प्रशासनिक परिपत्रों की वैधानिक स्थिति पर भी विचार किया जाना चाहिए।
शिकायतकर्ता ने सवाल उठाया है कि क्या कोई पुराना प्रशासनिक परिपत्र राष्ट्रपति के आदेश अथवा राज्य में लागू कानून के ऊपर प्रभावी हो सकता है। उनका कहना है कि पूरे मामले का परीक्षण वर्तमान कानून, संवैधानिक प्रावधानों और मूल अभिलेखों के आधार पर किया जाना चाहिए।
अंतरराज्यीय प्रवास और आरक्षण के अधिकार पर भी सवाल
शिकायतकर्ता पक्ष ने भारत सरकार की अंतरराज्यीय प्रवास संबंधी आरक्षण नीति का हवाला देते हुए दावा किया है कि किसी व्यक्ति की अनुसूचित जनजाति की सामाजिक पहचान और दूसरे राज्य में आरक्षण का अधिकार अलग-अलग कानूनी प्रश्न हैं।
उनका आरोप है कि यदि कोई व्यक्ति एक राज्य से दूसरे राज्य में प्रवास करता है तो केवल सामाजिक पहचान के आधार पर दूसरे राज्य में स्थानीय आरक्षण का लाभ स्वतः प्राप्त नहीं किया जा सकता। इसी आधार पर शिकायतकर्ता ने छत्तीसगढ़ में आरक्षित जिला पंचायत सीट से संबंधित पात्रता पर भी सवाल उठाए हैं।
स्वतंत्रता सेनानी के नाम के इस्तेमाल पर आपत्ति
शिकायतकर्ता पक्ष ने स्वतंत्रता सेनानी लाल श्याम शाह महाराज के नाम का उल्लेख करते हुए कहा है कि वे पूरे समाज के गौरव हैं, लेकिन किसी भी महान व्यक्तित्व के नाम अथवा सामाजिक सम्मान को किसी कथित अवैध प्रमाण पत्र को वैध ठहराने के आधार के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।
शिकायतकर्ता ने बिलासपुर उच्च न्यायालय के WPS No. 2987/2023 में 27 जनवरी 2026 को दिए गए निर्णय का भी हवाला दिया है और कहा है कि विवाह अथवा ससुराल के आधार पर किसी महिला को दूसरे राज्य में स्थानांतरित होने के बाद वहां के आरक्षण का लाभ मिलने के प्रश्न पर न्यायालय ने महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति स्पष्ट की है।
2018 की ग्राम सभा के रिकॉर्ड को लेकर गंभीर आरोप
मामले में सबसे गंभीर आरोप वर्ष 2018 में ग्राम पंचायत मोहला की कथित बैठक से संबंधित दस्तावेजों को लेकर लगाया गया है।
शिकायतकर्ता पक्ष के अनुसार, ग्राम पंचायत मोहला द्वारा RTI के तहत जारी जवाब, पत्र क्रमांक 427 दिनांक 22 जुलाई 2026, में कथित रूप से कहा गया है कि वर्ष 2018 की संबंधित बैठक का एजेंडा, आवेदन अथवा अन्य रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है।
शिकायतकर्ता का यह भी दावा है कि तत्कालीन उपसरपंच मिर्जा नूर बेग सहित कुछ वार्ड पंचों ने नोटरीकृत शपथ-पत्र प्रस्तुत कर उपस्थिति पंजी में दर्ज अपने हस्ताक्षरों को कथित रूप से कूटरचित एवं फर्जी बताया है। इन दस्तावेजों की वास्तविकता और कानूनी प्रभाव का अंतिम निर्धारण जांच एजेंसी अथवा सक्षम प्राधिकारी द्वारा किया जाना है।
86 पृष्ठों के साक्ष्य समिति के सामने प्रस्तुत करने का दावा
शिकायतकर्ता विवेक सिंह ने कहा कि 7 अगस्त 2026 को उच्च स्तरीय छानबीन समिति के समक्ष 86 पृष्ठों के दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत किए जा चुके हैं। उनका कहना है कि अब निर्णय भावनात्मक बयानों या राजनीतिक दबाव के आधार पर नहीं, बल्कि संविधान, कानून और सरकारी रिकॉर्ड के आधार पर होना चाहिए।
विवेक सिंह ने कहा कि यह लड़ाई किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि उन लोगों के संवैधानिक अधिकारों के संरक्षण की है जिन्हें अनुसूचित जनजाति के लिए निर्धारित आरक्षण का वास्तविक अधिकार प्राप्त है।
दूसरे राज्य से आए आदिवासी को छत्तीसगढ़ में आरक्षण का लाभ नहीं
सर्व आदिवासी समाज के कार्यकारी अध्यक्ष तुलाराम पिस्दा ने कहा कि नोटरीकृत बयान पर समाज अडिग है। हम सामाजिक और निवासी जानकारी सहित दस्तावेज के आधार पर मनाते है कि नम्रता सिंह दूसरे राज्य उड़ीसा की आदिवासी है, ऐसे में उन्हें छत्तीसगढ़ राज्य में आदिवासियों के आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए, उनके हक का आरक्षण उड़ीसा राज्य में है। वहां जाकर लाभ लेवे इससे किसी को कोई समस्या नहीं होगी। छत्तीसगढ़ में लाभ लेने से आदिवासियों के हक और अधिकार का हनन है, ऐसे में सर्व आदिवासी समाज इसका कड़ा विरोध करता है। चुकी जिम्मेदार पद पर है एक जनप्रतिनिधि है, उनके जगह कोई और भी होता समाज उसका विरोध करता ।
एक ओर जहां जाति प्रमाण पत्र के लिए सामान्य व्यक्तियों के एड़िया घिस जाति है, वही इनके जैसे उच्च पद में बैठे लोग आसानी से प्रमाण पत्र बनवा ले रहे हैं। ऐसी दोहरी नीति से उच नीच का भेद भाव पैदा होता है। सोशल मीडिया में श्रीमती जैन के समर्थकों ने जो दस्तावेज जारी किए हैं उससे साफ हो जाता है कि उनके पूर्वज उड़ीसा निवासी थे। सितम्बर 1950 के पूर्व रिकॉर्ड आधार पर ही जाति प्रमाण पत्र बनते हैं। केंद्रीय प्रशासनिक पदेन अधिकारियों के बच्चो को अन्य राज्य में प्रवासी के आधार पर जाति प्रमाण पत्र पहचान के आधार पर दिया जा सकता है ,किंतु आरक्षण नहीं ऐसे में हम शोषण के सख्त खिलाफ है। लड़ाई जारी रहेगी।
अब समिति के निर्णय पर टिकी निगाहें
नम्रता सिंह जैन के जाति प्रमाण पत्र को लेकर लगाए गए आरोपों और शिकायतकर्ता पक्ष द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों पर अंतिम निर्णय उच्च स्तरीय छानबीन समिति एवं संबंधित सक्षम प्राधिकारी के निष्कर्ष के बाद ही स्पष्ट होगा। फिलहाल दोनों पक्षों के दावों के बीच यह मामला संवैधानिक प्रावधानों, जाति प्रमाण पत्र की वैधता, मूल निवास और कथित ग्राम पंचायत दस्तावेजों की प्रामाणिकता जैसे महत्वपूर्ण सवालों के केंद्र में है।
NBP NEWS की ओर से स्पष्ट किया जाता है कि उपरोक्त समाचार में शिकायतकर्ता पक्ष द्वारा लगाए गए आरोप एवं दावे शामिल किए गए हैं। इन आरोपों को अंतिम रूप से सिद्ध तथ्य नहीं माना जाना चाहिए। अनावेदिका/संबंधित पक्ष का पक्ष और जांच समिति का अंतिम निर्णय सामने आने पर उसे भी समान प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।
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