पांचवीं अनुसूचित (आदिवासी) क्षेत्र में स्थित ग्राम पंचायत मोहला को नगर पंचायत बनाने की प्रक्रिया ने अब केवल स्थानीय नहीं, बल्कि संवैधानिक और राष्ट्रीय बहस का रूप ले लिया है। एक ओर प्रशासन इसे विकास और शहरी सुविधाओं से जोड़कर देख रहा है, वहीं दूसरी ओर आदिवासी समाज, किसान, मजदूर और महिला समूह यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या यह प्रक्रिया संविधान और पेसा कानून की भावना के अनुरूप है?
इस बीच, लोकसभा में 21 अगस्त 2025 को जनजातीय कार्य मंत्रालय द्वारा दिया गया जवाब मोहला जैसे क्षेत्रों के लिए बेहद अहम संकेत देता है।
संसद में उठा सवाल, मोहला से सीधा जुड़ाव
लोकसभा में सांसद राजकुमार रोत द्वारा पूछे गए सवाल में साफ पूछा गया कि—
🔴क्या अनुसूचित क्षेत्रों में नगर निकायों के गठन से पहले ‘पेसा’ की तर्ज पर ‘मेसा कानून’ बनाना अनिवार्य नहीं है?
🔴 और क्या बिना ऐसे कानून के बनाए गए नगर निकाय संविधान का उल्लंघन नहीं हैं?
यह सवाल सीधे-सीधे मोहला जैसे आदिवासी बहुल क्षेत्रों पर लागू होता है, जहां नगर पंचायत बनाने की कवायद चल रही है।
संविधान क्या कहता है?
केंद्र सरकार के जवाब के अनुसार—संविधान का अनुच्छेद 243ZC स्पष्ट करता है कि
अनुसूचित क्षेत्रों में नगरपालिकाओं से जुड़े प्रावधान स्वतः लागू नहीं होते।
🔴संसद कानून बनाकर ही इन क्षेत्रों में नगर निकायों को लागू कर सकती है।
🔴हालांकि, पांचवीं अनुसूची के तहत राज्यपाल को यह अधिकार है कि वह अधिसूचना जारी कर अनुसूचित क्षेत्र में नगर पंचायत के गठन की अनुमति दे सके।
यही वह संवैधानिक रास्ता है, जिसके आधार पर मोहला में नगर पंचायत बनाने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है।
बड़ा सवाल: मेसा कानून बिना नगर पंचायत क्यों?
सरकार ने माना है कि
नगरपालिकाओं के प्रावधान (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) विधेयक, 2001 यानी ‘मेसा विधेयक’ आज तक कानून नहीं बन पाया है।
यह विधेयक 2001 में संसद में आया
🔴2003 में संसदीय समिति की रिपोर्ट भी आई
🔴2020 के बाद राज्यों से दोबारा सुझाव मांगे गए
🔴लेकिन आज भी यह विचाराधीन है
ऐसे में सवाल उठता है कि
जब मेसा कानून बना ही नहीं, तो मोहला जैसे अनुसूचित क्षेत्रों में नगर पंचायत किस आधार पर बनाई जा रही है?
आदिवासी समाज की चिंता
मोहला एक आदिवासी बहुल क्षेत्र है, जहां जीवन और आजीविका ग्राम सभा, जंगल, जमीन और पारंपरिक व्यवस्थाओं पर आधारित है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि—
नगर पंचायत बनने से पेसा कानून की भूमिका कमजोर होगी
ग्राम सभा के अधिकार सीमित हो जाएंगे
मनरेगा, NRLM, प्रधानमंत्री आवास (ग्रामीण) जैसी योजनाएं बंद हो जाएंगी
महिला स्व-सहायता समूह और दिहाड़ी मजदूर सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे
लोगों का सवाल है—
“विकास के नाम पर क्या आदिवासियों और छेत्रवासियों से उनके संवैधानिक अधिकार छीने जा रहे हैं?”
विकास या बोझ?
नगर पंचायत बनने के बाद—
🔴संपत्ति कर
🔴जल कर
🔴सफाई कर
🔴व्यापार लाइसेंस शुल्क
जैसे कर लागू होंगे।
आदिवासी और गरीब परिवारों के लिए यह विकास कम, आर्थिक बोझ ज्यादा साबित हो सकता है।
मोहला सिर्फ एक नगर नहीं, एक सवाल है
मोहला का नगर पंचायत बनना सिर्फ एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि यह एक संवैधानिक परीक्षा है—
क्या आदिवासी क्षेत्रों में शहरीकरण ग्राम सभा की सहमति से होगा?
क्या मेसा कानून के बिना नगर निकाय बनाना उचित है?
क्या विकास की परिभाषा आदिवासियों और क्षेत्रवासियों की जरूरतों से तय होगी?
आज मोहला सवाल पूछ रहा है,
कल यह सवाल पूरे देश के अनुसूचित क्षेत्रों की आवाज बन सकता है।
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