एक तरफ सरकारी दीवारों पर लिखा है—“सब पढ़ें, सब बढ़ें” और “सर्वांगीण शिक्षा गुणवत्ता वर्ष”। दूसरी तरफ उसी सरकारी स्कूल में नन्हे बच्चे ऐसी जर्जर छत के नीचे बैठकर पढ़ने को मजबूर हैं, जहां हर दिन उनके सिर पर खतरा मंडरा रहा है।
यह तस्वीर मोहला विकासखंड के संकुल केंद्र रेंगाकठेरा अंतर्गत शासकीय प्राथमिक शाला विजयपुर की है। वर्ष 1981 में शुरू हुए इस विद्यालय के भवन को करीब 45 वर्ष हो चुके हैं। समय के साथ भवन की हालत इतनी खराब हो गई है कि अब यह बच्चों के लिए सुरक्षित स्कूल से ज्यादा किसी बड़े हादसे की आशंका नजर आता है।
विद्यालय में कक्षा पहली से पांचवीं तक कुल 24 बच्चे अध्ययनरत हैं। स्कूल में दो कमरे, एक बरामदा और एक कार्यालय है। लेकिन बरामदे और कार्यालय की छत की स्थिति बेहद चिंताजनक बताई जा रही है। सीमेंट-कंक्रीट जगह-जगह से झड़ चुका है और छत के अंदर का सरिया व लोहे की जाली खुले तौर पर दिखाई दे रही है। दो कक्ष की हालत थोड़ी बेहतर है।
बारिश में टपकती छत, बच्चों के सिर पर खतरा
बारिश के दौरान छत से पानी टपकने की स्थिति बच्चों और शिक्षकों के लिए परेशानी को और बढ़ा देती है। ऐसे में सवाल सिर्फ भवन की उम्र का नहीं, बल्कि बच्चों की सुरक्षा का है।
जिस उम्र में बच्चों के हाथों में किताब और कलम होनी चाहिए, उस उम्र में वे अपनी नजर किताब से ज्यादा छत की ओर रखने को मजबूर हों—कि कहीं ऊपर से कुछ गिर न जाए—तो यह शिक्षा व्यवस्था की कैसी तस्वीर है?
विद्यालय के बाथरूम की स्थिति भी जर्जर है, ऐसे में बच्चों को शौचालय के प्रयोग करने में भी खतरा बना हुआ है।
आदिवासी क्षेत्र में शिक्षा व्यवस्था पर लगातार सवाल
मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी जैसे आदिवासी बहुल क्षेत्र में शिक्षा को विकास की सबसे बड़ी बुनियाद माना जाता है। लेकिन विजयपुर स्कूल की तस्वीरें एक बड़ा सवाल खड़ा करती हैं—क्या ग्रामीण और आदिवासी इलाकों के सरकारी स्कूलों की सुरक्षा और बुनियादी सुविधाएं वास्तव में प्रशासन की प्राथमिकता हैं?
शिक्षकों की माने तो स्कूल की जर्जर स्थिति को देखकर गांव के ही सामुदायिक भवन में स्कूल का संचालन हो रहा था , बिजली व्यवस्था और अन्य टेबल चेयर की व्यवस्था की जा रही है जिसके चलते वर्तमान में स्कूल बिल्डिंग में कक्षा संचालित की जा रही है।
जैसे ही मूलभूत सुविधाओं की व्यवस्था हो जाएगी कक्षा को दोबारा से सामुदायिक भवन में संचालित किया जाएगा।
बीईओ राजेंद्र देवांगन ने बताया कि सर्वे कर विजयपुर प्राथमिक शाला की जर्जर स्कूल की जानकारी राज्य सरकार को भेजी जा चुकी है। स्वीकृति मिलते ही नया भवन बनेगा तब तक वैकल्पिक तौर पर भवन में स्कूल संचालित होगा।
सरकारें शिक्षा की गुणवत्ता, स्मार्ट क्लास, डिजिटल शिक्षा और बेहतर परिणामों की बात करती हैं। लेकिन अगर बच्चे सुरक्षित भवन तक से वंचित हों, तो फिर गुणवत्ता वाली शिक्षा की बात कितनी जमीन पर उतरती है?
सबसे बड़ा सवाल—हादसे का इंतजार क्यों?
बच्चों का भविष्य सिर्फ किताबों से नहीं, सुरक्षित स्कूल से भी बनता है
विजयपुर के इन 24 बच्चों का सवाल सिर्फ एक स्कूल का सवाल नहीं है। यह उस सोच का सवाल है जिसमें दूरदराज के गांवों के बच्चों को भी शहरों के बच्चों की तरह सुरक्षित और बेहतर शिक्षा का अधिकार मिले।
सरकारी योजनाओं की सफलता का असली पैमाना कागजों में नहीं, बल्कि ऐसे गांवों के स्कूलों में दिखाई देना चाहिए।
एक जर्जर छत के नीचे बैठा बच्चा सिर्फ पढ़ाई नहीं कर रहा—वह व्यवस्था से एक सवाल भी पूछ रहा है।
“हमारे सिर पर सुरक्षित छत कब होगी?”
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