एक ओर मंच से सरकार की योजनाओं और “सुशासन” का गुणगान किया जा रहा था, दूसरी ओर उसी कार्यक्रम में पहुंचे सैकड़ो ग्रामीण बूंद-बूंद पानी के लिए भटकते नजर आए। मामला जिला मुख्यालय मोहला से लगे ग्राम पंचायत मजियापार के आश्रित ग्राम हेरकुटुंभ का है, जहां सोमवार को आयोजित सुशासन तिहार 2026 कई सवालों के घेरे में आ गया।
चिलचिलाती गर्मी, उमस और भारी भीड़ के बीच प्रशासनिक अव्यवस्था ऐसी दिखी कि लोग कार्यक्रम स्थल पर ही व्यवस्था को कोसते नजर आए। सबसे गंभीर स्थिति पीने के पानी को लेकर रही। कार्यक्रम में रखी गई पानी की जार कुछ ही देर में खाली हो गईं, लेकिन उन्हें दोबारा भरने की कोई व्यवस्था नहीं थी। हालत यह रही कि ग्रामीण हाथों में बोतल लेकर इधर-उधर पानी तलाशते घूमते रहे।
हैरानी की बात यह रही कि जहां पानी की जार रखी गई थी, वहां डिस्पोजल ग्लास तक उपलब्ध नहीं थे। न स्टील के गिलास, न प्लास्टिक के। लोग मजबूरी में हाथों से पानी पीने को विवश दिखे या किसी अन्य का बोतल लेकर पानी पिए।
ग्रामीणों का आरोप है कि जिम्मेदार अधिकारी और व्यवस्थापक कूलर के सामने बैठकर हवा खाते रहे, जबकि आम लोग गर्मी से बेहाल होकर पानी के लिए परेशान होते रहे। ग्रामीणों ने तंज कसते हुए कहा —
“शायद प्रशासन ने दो - चार कैन रखकर मान लिया कि व्यवस्था पूरी हो गई, पानी खत्म हो जाए तो हमारी जिम्मेदारी नहीं।”
“अगर जिम्मेदारी हमें देते तो गांव बदनाम नहीं होता”
हेरकुटुंभ के कुछ ग्रामीणों ने नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि यदि पानी पिलाने की जिम्मेदारी गांव के लोगों को दी जाती, तो वे खुद सबको पानी पिला देते और गांव की छवि खराब नहीं होती।
ग्रामीणों ने सवाल उठाया कि जब प्रशासन को हजारों लोगों के आने की जानकारी थी, तो पर्याप्त पानी, कूलर, पंखे और बैठने की व्यवस्था क्यों नहीं की गई?
ग्रामीण कार्यक्रम में अचंभित तब हुए जब उनकी नजर एंट्रेंस गेट पर लगी फ्लेक्स पर ग्राम पंचायत हेरकुटुंभ लिखा गया था। जबकि क्लस्टर हेरकुटुंभ लिखा जाना चाहिए था। चुकी ग्राम पंचायत मजियापार का आश्रित ग्राम हेरकुटुंभ ।
सुशासन में भी नहीं सुनी जा रही जनता की आवाज
कार्यक्रम में पहुंचे कई ग्रामीणों ने अपनी वर्षों पुरानी समस्याएं फिर प्रशासन के सामने रखीं, कुछ तो प्रत्येक सुशासन में आवेदन दे रहे है लेकिन लोगों के चेहरों पर भरोसे से ज्यादा निराशा दिखाई दी।
“प्याऊ में दोपहर तक पानी खत्म”
जिला मुख्यालय मोहला से पहुंचे ग्रामीण जैनुद्दीन खान, लक्की वैष्णव, राजू द्विवेदी ने बताया कि बस स्टैंड स्थित प्याऊ में दोपहर तक पानी खत्म हो जाता है। यात्री पानी के लिए भटकते हैं, होटल वाले पानी मांगने पर भगा देते हैं और मजबूरी में बोतल खरीदनी पड़ती है। पंचायत में कई बार शिकायत के बावजूद समस्या जस की तस बनी हुई है।
आवास योजना के लिए दर-दर भटक रही सुगदी बाई
मोहला निवासी सुगदी बाई ने बताया कि वह लगातार कई सुशासन तिहारों में आवेदन दे चुकी हैं, लेकिन अब तक प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ नहीं मिला। मैं भाजपा की कार्यकर्ता हूं सरकार से बहुत उम्मीद है...
सुशासन का करेंगे विरोध
मरकाटोला के ग्रामीणों ने आरोप लगाया लगातार कई वर्षों से सड़क के लिए शासन प्रशासन के चक्कर मार रहे हैं। सुशासन में भी प्रत्येक वर्ष आवेदन लगा रहे हैं फिर भी सड़क नहीं बन पा रहा है बारिश में रास्ता कीचड़ मई हो जाता है , अगर इस बार आवेदन का निराकरण नहीं हुआ तो आने वाले वर्ष में सुशासन त्यौहार का विरोध करेंगे।
महीनों से चक्कर काट रही राजकुंवर
मजियापार निवासी राजकुंवर ने बताया कि पेंशन और महतारी वंदन योजना का लाभ पाने के लिए महीनों से कार्यालयों के चक्कर लगा रही हैं, लेकिन अब तक कोई समाधान नहीं हुआ।
बकरी शेड की मांग प्रत्येक सुशासन त्यौहार पर
मोहला निवासी प्रफुल्ल थानथर्राते ने बताया कि कई वर्षों और लगातार दूसरी बार बकरी शेड की मांग कर रहे है, पर मांग पूरी नहीं हो रही है ऐसे में सुशासन त्यौहार पर सवाल उठ रहे हैं।
“अब प्रशासन पर भरोसा उठने लगा”
गौतर बाई ने कहा कि वह कई बार पट्टा की मांग लेकर प्रशासन के द्वार और सुशासन शिविरों में पहुंच चुकी हैं, लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन मिला। उनका कहना था कि अब शासन-प्रशासन से भरोसा उठने लगा है।
मंच पर योजनाओं का बखान, जमीन पर अव्यवस्था
कार्यक्रम में एक ओर अधिकारी योजनाओं की लंबी-लंबी जानकारी दे रहे थे, वहीं दूसरी ओर कुछ विभागीय कर्मचारी कूलर को घेर कर कुर्सियां डालकर घंटों गप्पे मारते नजर आए। जबकि लाभार्थी गर्मी में खड़े होकर योजनाओं की बातें सुनते रहे।
यह दृश्य वहां मौजूद लोगों को सबसे ज्यादा खटकता रहा। लोगों का कहना था कि जिनके लिए कार्यक्रम आयोजित किया गया, उन्हीं को सबसे कम सुविधा मिली।
ड्राइविंग लाइसेंस स्टॉल भी बना मजाक
परिवहन विभाग द्वारा ड्राइविंग लाइसेंस बनाने का स्टॉल लगाया गया था। बड़ी संख्या में ग्रामीण लाइसेंस बनवाने पहुंचे, लेकिन “सर्वर डाउन” की समस्या के कारण अधिकांश लोग बिना काम कराए लौट गए।
हजारों ग्रामीण, लेकिन बैठने तक की जगह नहीं
कार्यक्रम में हजारों की संख्या में ग्रामीण पहुंचे थे, लेकिन बैठने की पर्याप्त व्यवस्था नहीं थी। कई लोग कार्यक्रम स्थल के बाहर सड़क किनारे बैठकर कार्यक्रम को सुनते रहे। महिलाओं, बुजुर्गों और दूरदराज से आए ग्रामीणों को सबसे ज्यादा परेशानी उठानी पड़ी।
लोगों का कहना था कि यदि इतनी बड़ी संख्या में लोगों को बुलाया गया था, तो क्या प्रशासन ने पहले से कोई तैयारी नहीं की थी?
सवालों के घेरे में पीडब्ल्यूडी के नोडल अधिकारी
पूरे आयोजन में सबसे ज्यादा सवाल पीडब्ल्यूडी के नोडल अधिकारी की व्यवस्थाओं को लेकर उठ रहे हैं। सुशासन त्यौहार में अव्यवस्था आखिर क्यों? कहा थे अधिकारी क्यों नहीं व्यवस्था को लेकर चुस्ती दिखाई।
जिस कार्यक्रम का उद्देश्य “जन समस्याओं का समाधान” और “सुशासन की अनुभूति” कराना था, वहीं ग्रामीण खुद बुनियादी सुविधाओं — पानी, पर्याप्त कूलर - पंखा और बैठने की जगह — के लिए संघर्ष करते दिखे।
दूसरी ओर प्रशासन ने दूर दराज से पहुंचे ग्रामीणों के लिए खाने की उचित व्यवस्था कर रखी थी ताकि कोई भूखा न रहे। कार्यक्रम स्थल पर विभागीय स्टाल बखूबी लगे थे ग्रामीणों को योजनाओं की जानकारी दी जा रही थी वही कुछ महिला समूह अपने वस्तुओं का प्रचार प्रसार और बेच कर आमदनी भी कमा रहे थे।
बड़ा सवाल...
जब “सुशासन” के नाम पर आयोजित सरकारी कार्यक्रम में ही लोग प्यासे भटकें, महिलाएं और बुजुर्ग सड़क किनारे बैठने को मजबूर हों, सर्वर के नाम पर काम ठप हो जाए और वर्षों से आवेदन देने वाले हितग्राहियों को सिर्फ आश्वासन मिले —
तो आखिर जनता किसे सुशासन माने?
हेरकुटुंभ का यह दृश्य अब प्रशासनिक दावों और जमीनी हकीकत के बीच की बड़ी खाई को उजागर कर रहा है।
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